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Friday, 24 July 2015

साहिर लुधियानवी....

लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई......
इस राज़ को क्या जाने साहिल के तमाशाई
हम डूब के समझे हैं दरिया तेरी गहराई

जाग ए मेरे हमसाया ख़्वाबों के तसलसुल से
दीवारों से आँगन में अब धूप उतर आई

चलते हुए बादल के साये के त-अक्कुब में
ये तशनालबी मुझको सहराओं में ले आई

ये जब्र भी देखे हैं तारीख की नज़रों ने
लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पायी

क्या सानेहा याद आया मेरी तबाही का
क्यूँ आपकी नाज़ुक सी आँखों में नमी आई....

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